Eleutheromania

दूर दराज़, कश्तियों के शोर से वाकिफ़ हुँ में ,
हा एक मुसाफिर हुँ में ।

रिश्तो की डोर में उलझा सा था , आज उड़ने को बेताब हुँ में,
हा एक मुसाफिर हुँ में ।

एक पल में अश्क़ाे मे बेह जाना , फिर मुस्का कर दर्द भूल जाना ,
आसमा की रज़ाई ओढ़ , चाँद का तकिया सर लगाकर , धरती की गोद में सो जाना ,

किरणो के साथ , फिर बंजारे सा निकल जाता हुँ में ,
हा एक मुसाफिर हुँ में।

©Kashvikhan (2020)

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